A Feast of Vultures, by Josy Joseph | जोसी जोसेफ की ‘अ फ़ीस्ट ऑफ वल्चर्स’ – Book Review in Hindi

जोसी जोसेफ की ‘अ फ़ीस्ट ऑफ वल्चर्स’ – लोकतंत्र, भ्रष्टाचार और सत्ता के छिपे खेल का सच

A Feast of Vultures, by Josy Joseph. Book Review in Hindi

256 pages | English

Review by Dinesh Dhawane


लोकतंत्र के पीछे की अँधेरी परतें: एक बेबाक़ शुरुआत

जोसि जोसफ की क़िताब A Feast of Vultures एक ऐसी किताब है जो लोकतंत्र के चमकदार चेहरे के पीछे छुपी हुई गंदगी को बेनक़ाब करती है। इस किताब का मक़सद सिर्फ़ भ्रष्टाचार दिखाना नहीं, बल्कि उस पूरे निज़ाम को समझाना है जहाँ फ़ैसले, मौक़े और (privileges) प्रिविलेजेस अक्सर बीच के लोगों के ज़रिए तय होते हैं।

लेखक बताते हैं कि भारत में काम सीधा नहीं चलता, बल्कि recommendation, पहुँच और influence के पुराने नेटवर्क से चलता है। इसी वजह से किताब बार-बार यह एहसास कराती है कि असली पावर अक्सर उन लोगों के पास होती है जिनके नाम हेडलाइंस में कम, और corridors में ज़्यादा मिलते हैं।

“द मिडलमेन”: सत्ता के अदृश्य संचालक

“द मिडलमेन” वाले हिस्से में यह बात और साफ़ हो जाती है कि एक छोटा काम हो या बड़ा रक्षा सौदा, दरमियानी किरदार ही पूरे सिस्टम को चलाते हैं। ये (middlemen) बिचौलिये सिर्फ़ मददगार नहीं, बल्कि पूरे governance model का हिस्सा बन जाते हैं।

“In India, nothing moves without the middlemen.”

जब रक्षा जैसी सेंसेटिव फील्ड में ऐसे लोग घुस जाते हैं, तो क़ौमी सलामती और public trust दोनों पर सवाल उठते हैं। इस नज़रिए से किताब का पहला भाग एक ऐसी दुनिया खोलता है जहाँ काम दूसरों के नाम से होता है, मगर फ़ायदा कुछ और ही लोग उठा लेते हैं। यह सच बहुत कड़वा है, लेकिन जोसी जोसेफ उसे सीधे, साफ़ और बिना लाग-लपेट के पेश करते हैं।

“द वेरी प्राइवेट सेक्टर”: कारोबार, सियासत और अंडरवर्ल्ड का गठजोड़

दूसरे हिस्से “द वेरी प्राइवेट सेक्टर” में कहानी और भी दिलचस्प हो जाती है। यहाँ East-West Airlines जैसे मामलों, business rivalry, underworld links और hush-up investigation का नज़ारा मिलता है।

लेखक यह दिखाते हैं कि private sector हमेशा निजी मामला नहीं होता, क्योंकि उसके फ़ैसले कई बार सियासत और हुकूमत तक को प्रभावित कर देते हैं।

“The private sector in India is often deeply political.”

इस चैप्टर से एक और नुक्ता सामने आता है कि ताक़त और पैसे का रिश्ता सिर्फ़ सड़क पर नहीं, बल्कि offices, boardrooms और सदन तक फैला हुआ है। इसी वजह से किताब थ्रिलर जैसी लगती है, लेकिन उसका एजेंडा पूरी तरह खोजी (investigative) है। यहाँ पाठक को यह भी समझ आता है कि विकास और व्यापार की भाषा के पीछे कौन-कौन सी छुपी हुई चालें काम कर रही हैं।

जोसी जोसफ पाठक को आराम नहीं लेने देते; वह हर पन्ने पर नई बेचैनी पैदा करते हैं और यही बेचैनी इस किताब की सबसे बड़ी ताक़त है।

“द बिग लीग”: जब लोकतंत्र बाज़ार बन जाता है

“द बिग लीग” वाला हिस्सा किताब को सबसे ऊपर ले जाता है। इसमें लेखक उन लोगों पर सीधे वार करते हैं जिनके नाम रोज़ अख़बारों में आते हैं।

यह भाग दिखाता है कि कैसे बड़े व्यापारी (businessman), राजनेता, और सत्ता के दलाल, मिलकर लोकतंत्र को अपने फ़ायदे का बाज़ार बना देते हैं।

आपके फ़ोकस में बार-बार जो जुमला उभरता है, “everyone is for sale,” वही इस किताब की रूह है। यह विश्लेषण पाठक को ग़ुस्सा भी दिलाता है और सोचने पर मजबूर भी करता है।

“Everyone is for sale, the only question is the price.”

अगर पूरा निज़ाम ही खरीद-फ़रोख़्त पर खड़ा हो, तो आम आदमी की जगह कहाँ बचती है। किताब का यही हिस्सा सबसे ज़्यादा चुभता है, क्योंकि यह नाम लेकर नहीं, निज़ाम की असल शक्ल खोलकर रख देता है। और इसीलिए यह हिस्सा सबसे साहसी भी लगता है।

पत्रकारिता का सब्र और सच्चाई का बोझ

आख़िर में, A Feast of Vultures भारत की लोकतांत्रिक सच्चाई को ideal नहीं, बल्कि contested और compromised reality के रूप में पेश करती है।

जोसी जोसफ की पत्रकारिता की सबसे बड़ी ताक़त उनका सब्र, उनकी नज़र और उनका सबूत-आधारित अंदाज़ है। वह भाषण नहीं देते, बल्कि निज़ाम के अंदर घुसकर उसकी परतें खोलते हैं।

किताब का अंदाज़ सख़्त है, मगर उसी सख़्ती में उसकी सच्चाई छुपी है। यह वह लेखन है जो बताता है कि भ्रष्टाचार सिर्फ़ एक बुरा अमल नहीं, बल्कि एक पूरा सांस्कृतिक (Cultural) और राजनीतिक (Political) वातावरण भी हो सकता है। और इसी लिए यह किताब पढ़ना सिर्फ़ क़िताब पढ़ने का अनुभव नहीं, बल्कि एक “राजनीतिक रहस्योद्घाटन” या “राजनीतिक पर्दाफाश” लगता है।

अंतिम विचार: सवालों की ज़रूरत

यह किताब हमें यह भी याद दिलाती है कि सच्चाई कभी-कभी सुखद नहीं होती, मगर उसे जानना ज़रूरी होता है। इस किताब की अहमियत इसलिए भी है कि यह हमें सवाल करना सिखाती है, कौन फ़ैसले ले रहा है, कौन फ़ायदा उठा रहा है, और कौन चुप है।

“Democracy demands questions, not silence.”

जब तक इन सवालों का जवाब नहीं मिलेगा, तब तक लोकतंत्र सिर्फ़ एक नाम बना रहेगा। यह पुस्तक उसी नाम के पीछे छुपी हुई हक़ीक़त को सामने रखती है, और यही इसकी सबसे बड़ी पहचान है।


About the author: Dinesh Dhawane

Dinesh Dhawane - Nagpur Book ClubDinesh Dhawane is a passionate bibliophile, rare and vintage book collector, and reviewer, with one of the largest personal libraries in the country. Deeply drawn to Marathi, Hindi, and Urdu literature, he brings sensitivity and insight to his reviews.

He has also authored several academic works and, as a Core Committee Member of the Nagpur Book Club and Nagpur Film Society, actively promotes literary and cinematic culture.

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