एंटीगोनी : सोफ़ोक्लीज़ की अमर त्रासदी – पुस्तक समीक्षा | Antigone, by Sophocles – Book Review in Hindi

Antigone, by Sophocles. Book Review in Hindi, by Dinesh Dhawane, Nagpur Book Club80 pages | English

Review by Dinesh Dhawane


सोफ़ोक्लीज़ का मशहूर ड्रामा “एंटीगोनी” तक़रीबन 441 ईसा पूर्व के ज़माने में लिखा गया था, जब एथेंस अपने “ज़रीन दौर” से गुज़र रहा था। ये वही वक़्त था जब सियासतदान पेरिकल्स के दौर में जम्हूरियत (लोकतंत्र), फ़न व अदब (कला-संस्कृति) की बुलंदी और साम्राज्यवादी विस्तार अपने चरम पर थे। ये ड्रामा उसी दौर की पैदाइश है, जो राजनीतिक तनावों और राज्य के कानून और व्यक्तिगत नैतिकता के बीच संबंधों पर दार्शनिक बहसों को दर्शाता है।

पौराणिक पृष्ठभूमि


थेबन नाटक

ड्रामा “एंटीगोनी” ओडिपस और उसके ख़ानदान की कहानियों पर बनी एक सिलसिला-वार त्रासदी का हिस्सा है, जिसे थेबन नाटक कहा जाता है। सोफ़ोक्लीज़ के ज़माने के लोगों को थेब्स की ये दास्तानें अच्छी तरह मालूम थीं। इस सिलसिले की आख़िरी कहानी “एंटीगोनी” है, जिसमें सोफ़ोक्लीज़ ने दिखाया कि कैसे ओडिपस के ख़ानदान पर लगने वाला लानत (श्राप) आख़िर में उनकी तबाही का सबब बनता है। दिलचस्प बात ये है कि सोफ़ोक्लीज़ ने सबसे पहले “एंटीगोनी” ही लिखा था — बाद में ओडिपस रेक्स और ओडिपस एट कोलोनस लिखे। मगर “एंटीगोनी” की कहानी बाक़ी दोनों के बाद की है, यानी ये उस क़िस्से का आख़िरी हिस्सा बताती है।

“A city which belongs to just one man is no true city”

पौराणिक कथाओं में मिसाल

हालाँकि “एंटीगोनी” की कहानी यूनानी (ग्रीक) दास्तानों से निकली है, लेकिन सोफ़ोक्लीज़ पहले शख़्स नहीं थे जिन्होंने इस क़िस्से पर ड्रामा लिखा। उनसे पहले एस्किलस ने अपने नाटक सेवन अगेंस्ट थेब्स के आख़िरी हिस्से में एंटीगोन को दिखाया था। मगर सोफ़ोक्लीज़ का लिखा हुआ वर्ज़न सबसे ज़्यादा मशहूर और असरदार माना जाता है, जिसने इस कहानी को आने वाली नस्लों के लिए एक मुकम्मल दे दी।

पेरिक्लीयन एथेंस का स्वर्ण युग


लोकतांत्रिक आदर्श और साम्राज्यवादी शक्ति

सोफ़ोक्लीज़ के ज़माने में एथेंस अपनी ताक़त और शौहरत के चरम पर था। उस दौर में जम्हूरियत (लोकतंत्र) खूब फली-फूली, और पहले से ज़्यादा लोग हुकूमत (सरकार) के कामों में हिस्सा लेने लगे थे। उसी वक़्त एथेंस ने डेलियन लीग के ज़रिये बाकी यूनानी शहर-रियासतों पर अपना असर बढ़ा लिया था, जिससे वो एक तरह का बड़ा साम्राज्य बन गया। लेकिन इसी बात से अंदरूनी टकराव भी पैदा हुआ — एक तरफ़ आज़ादी और बराबरी के उसूल, और दूसरी तरफ़ दूसरों पर जबरी क़ाबू (सत्तावादी रवैया)।

“एंटीगोनी” में सोफ़ोक्लीज़ ने जिस तरह क्रेओन जैसे तानाशाह को दिखाया, वो उस वक़्त के एथेंस के लोगों को ज़रूर पसंद आया होगा — क्योंकि वो लोग अपनी जम्हूरियत पर फ़ख़्र करते थे और हर तानाशाही से चौकन्ने रहते थे।

सैन्य संदर्भ

ये ड्रामा उस वक़्त पेश किया गया जब एथेंस ने समोस नाम के टापू पर फ़ौजी मुहिम शुरू करने की तैयारी की थी। उस वक्त सोफ़ोक्लीज़ ख़ुद दस एथेनियाई जर्नलों में से एक थे। इस ड्रामे की फौजी पृष्ठभूमि — जो एक गृह युद्ध के बाद की कहानी दिखाती है — उस ज़माने की असल सियासी और फौजी परेशानियों को बयान करती है। इसमें ऐसे सवाल उठते हैं कि कब बग़ावत (विद्रोह) जायज़ है और जंग के दौर में एक शहरी (नागरिक) का फ़र्ज़ क्या होना चाहिए।

दर्शनशास्त्र का उदय

पाँचवीं सदी ईसा पूर्व में में यूनान में नए दार्शनिक ख़यालात उभरने लगे। इन लोगों ने पुराने यक़ीनात पर सवाल उठाने शुरू किए और दुनिया को अक़्ल और तर्क से समझने की कोशिश की। सोफिस्ट कहलाने वाले फ़लसफ़ी उस दौर में इंसाफ़ और क़ानून के मतलब पर बहस किया करते थे। यही बदलाव सोफ़ोक्लीज़ के ड्रामे “एंटीगोनी” में दिखता है — जहाँ क्रेओन इंसान के बनाए क़ानून (नोमोस) पर ज़ोर देता है, जबकि एंटीगोन रब (दैवीय) के अलिखित क़ानून की पैरवी करती है। ड्रामे का कोरस, जो शुरू में बादशाह के साथ होता है, असल में उस समाज की झलक दिखाता है जो इन नए इल्मी (बौद्धिक) ख़यालों और पुराने उसूलों के दरमियान उलझा हुआ था।

यूनानी धार्मिक और नागरिक परंपराएँ

दैवीय बनाम मानवीय कानून

“एंटीगोनी” में सबसे बड़ा टकराव रब के क़ानून और इंसानी (नागरिक) क़ानून के बीच है। यूनानी मज़हबी रिवायतों में माना जाता था कि मरने वालों की रूह को पाताल लोक (जमिन के नीचे की दुनिया) में सुकून से जाने के लिए उनका सही तरीक़े से अंतिम संस्कार होना ज़रूरी है। एंटीगोनको पूरा यक़ीन था कि ये रब का हुक्म है, और उसे हर हाल में इस अम्र (आदेश) को मानना चाहिए — चाहे इसके लिए अपनी जान ही क्यों न देनी पड़े।

दूसरी तरफ़, क्रेओन ने जब उस पर पाबंदी लगाई, तो एंटीगोनी ने सीधी बग़ावत कर दी। बाद में जब अंधे पैग़म्बर टायरेसियस ने उसे चेतावनी दी, तब भी क्रेओन अपनी ज़िद छोड़ने को तैयार नहीं हुआ। यही उसका अहंकार और अधर्म था, जिसने आख़िरकार उसे उसके दुखद अंजाम तक पहुंचा दिया।

लिंग और सामाजिक व्यवस्था

यूनानी समाज घोर पितृसत्तात्मक था, जहाँ महिलाओं को मुख्यतः घरेलू दायरे तक ही सीमित रखा गया था। ऐसे में जब एंटीगोनी ने एक मर्द हाकिम (क्रेओन) के हुक्म के ख़िलाफ़ खुलकर बग़ावत की, तो ये उस वक़्त के समाज के लिए एक इंक़लाबी (क्रांतिकारी) कदम था। इसने एथेंस के दर्शकों को हिला कर रख दिया होगा।

क्रेओन का ग़ुस्सा इसलिए भी बढ़ गया, क्योंकि उसकी ना-फ़रमानी (अवज्ञा) किसी आम शहरी ने नहीं, बल्कि एक औरत ने की थी। इसके मुकाबले में इस्मीन, यानी एंटीगोन की बहन, उस दौर की “फ़रमाबरदार” औरत की मिसाल है — जो समाज के तय किए गए क़ायदे क़ानून से बाहर नहीं जाती।

पात्र परिचय

एंटीगोनी

एंटीगोनी थेब्स के निर्वासित राजा ओडिपस और रानी जोकास्टा की सबसे बड़ी बेटी है। एंटीगोन, पोलिनीसिस, एटेक्लीस और इस्मीन की बहन है। अपनी नरम और आज्ञाकारी बहन इस्मीन के मुक़ाबले में, एंटीगोन को एक मज़बूत और जज़्बाती औरत के रूप में दिखाया गया है, जो अपने ख़ानदानी फ़र्ज़ को अच्छी तरह समझती है। उसकी बातें और इस्मीन के साथ उसके मुक़ालमे (संवाद) से साफ़ झलकता है कि उसमें भी अपने चाचा क्रेओन जैसी ज़िद और अड़ियलपन है। वो अपने मरे हुए भाई पोलिनीसिस की इज़्ज़त और आख़िरी फ़र्ज़ निभाने के लिए, किसी भी सज़ा या नतीजे की परवाह किए बग़ैर क्रेओन के हुक्म को ठुकरा देती है।

“It is the dead, not the living, who make the longest demands.”

इस्मीन

इस्मीन को एंटीगोनी की मददगार के तौर पर दिखाया गया है, जो दोनों बहनों के रवैये में फर्क बताती है। वो अपनी बहन से ज़्यादा क़ानून-परस्त और हाकिम की बात मानने वाली है। क्रेओन से डरकर वो अपने भाई पोलिनीसिस को दफ़नाने के काम से हिचकिचाती है, क्यूंकि उसे सज़ा और नतीजे का डर सताता है।

क्रेओन

क्रेओन थीबस का बादशाह है, जो ये समझता है कि कानून ही इंसान की खुशियों की गारंटी है। उसको एक दुखद नायक (tragic hero) भी कहा जा सकता है, क्योंकि वो अपने ईमान और यक़ीन के मुताबिक सही काम करने की कोशिश में सब कुछ खो देता है। जब उसे देवताओं को राज़ी करने के लिए अपना हुक्म बदलना पड़ता है, तब भी वो पहले पोलिनाइसिस की लाश का ख़याल रखता है और उसके बाद एंटीगोनी को आज़ाद करता है।

“There is no greater evil than men’s failure to consult and to consider.”

यूरीडाइस

यूरीडाइस थीबस की मलिका है और क्रेओन की बीवी। वो आख़िर में दिखाई देती है जब उसे अपने बेटे हेमोन की मौत की ख़बर सुनाई जाती है। ग़म और दर्द से टूटकर वो क्रेओन को कोसती है, क्योंकि वो उसी को अपने बेटे की मौत का ज़िम्मेदार समझती है, और फिर ख़ुदकुशी कर लेती है।

हेमोन

हेमोन, क्रेओन और यूरीडाइस का बेटा है, और उसकी मंगनी एंटीगोनी से हुई होती है। वो अपने बाप क्रेओन से ज़्यादा समझदार साबित होता है और एंटीगोनी के लिए उससे बहस करने की कोशिश करता है। लेकिन जब क्रेओन उसकी बात मानने से इंकार कर देता है, तो हेमोन ग़ुस्से में चला जाता है और कहता है कि अब उसका बाप उसे कभी नहीं देख पाएगा। बाद में जब वो एंटीगोन को मरा हुआ देखता है, तो वो भी अपनी जान ले लेता है।

“A man, though wise, should never be ashamed of learning more, and must unbend his mind”,

“एक व्यक्ति को, चाहे वह कितना भी बुद्धिमान क्यों न हो, अधिक सीखने में कभी भी शर्म नहीं करनी चाहिए, तथा उसे अपने मन को लचीला बनाना चाहिए”, यह क्रेओन की कठोरता के विपरीत विनम्रता और खुले विचारों का आह्वान है।

कोरिफ़ायोस

कोरिफ़ायोस बादशाह क्रेओन का मददगार और कोरस का लीडर है। उसे अकसर राजा का क़रीबी मशविरा देने वाला और घर का अपना आदमी समझा जाता है। आख़िर में ये बात साफ़ होती है जब क्रेओन कोरिफ़ायोस की सलाह मानने का फ़ैसला करता है।

तिरेसियास

तिरेसियास एक अंधा पैग़म्बर है जिसकी बातों की वजह से आख़िर में पोलिनाइसिस का ठीक तरह से अंतिम संस्कार किया जाता है। उसे समझदार और अक़्लमंद इंसान के तौर पर दिखाया गया है। तिरेसियास क्रेओन को उसकी नादानी पर आगाह करता है और बताता है कि खुदा उनसे नाराज़ हैं। वो क्रेओन को मानने पर राज़ी तो कर लेता है, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है और एंटीगोनी को बचाया नहीं जा सकता।

कोरस

कोरस थीबस के बुज़ुर्ग मर्दों का एक समूह है, जो शुरू में बादशाह के लिए इज़्ज़त और एहतराम रखता है। उनका मक़सद कहानी की घटनाओं पर राय देना, रहस्य और जज़्बात को बढ़ाना, और कहानी को पुराने अफ़सानों और दास्तानों से जोड़ना है। जैसे-जैसे ड्रामा आगे बढ़ता है, वो लोग क्रेओन को समझाते हैं कि उसे थोड़ा सब्र और तहम्मुल से काम लेना चाहिए। उनकी दरख़्वास्त पर क्रेओन इस्मीन को छोड़ देने पर राज़ी हो जाता है। वो उसे तिरेसियास की सलाह मानने की भी हिदायत देते हैं।

“Great words of prideful men are ever punished with great blows, and, in old age, teach the chastened to be wise.”. 

“घमंडी लोगों के बड़े-बड़े शब्द हमेशा बड़े प्रहारों से दण्डित होते हैं, और बुढ़ापे में, वे ताड़ना करने वालों को बुद्धिमानी सिखाते हैं।” कोरस का यह उद्धरण स्पष्ट रूप से क्रेओन के पतन की ओर इशारा करता है, और इस बात पर ज़ोर देता है कि वह जो कष्ट झेल रहा है, वह उसके अहंकार की सीधी सज़ा है। यह उद्धरण बताता है कि एक अच्छे राजा का कर्तव्य विनम्रता और देवताओं के प्रति सम्मान के साथ शासन करना है, न कि अंध-अभिमान से।

संक्षेप में एंटीगोनी नाटक का सारांश

थीब्स की ख़ूनी जंग के बाद दोनों भाई पोलिनीसीस और एटेओक्ल्स, एक-दूसरे के हाथों मारे जाते हैं, यूँ अपने बाप ओडिपस की बद्दुआ को पूरा करते हुए। शहर तो बच जाता है, मगर अब क्रेओन हुकूमत सँभालता है। वो एलान करता है कि एटेओक्ल्स को इज़्ज़त से दफ़नाया जाएगा, जबकि गद्दार पोलिनीसीस की लाश यूँ ही सड़ती रहेगी। जो कोई उसे दफ़नाने की कोशिश करेगा, उसे सबके सामने संगसारी (पत्थर मारकर मौत) दी जाएगी। इस नाइंसाफ़ी से ग़ुस्से में आकर एंटीगोन फ़ैसला करती है कि वो अपने भाई को हर हाल में दफ़न करेगी। उसकी बहन इस्मीन डर जाती है और मना कर देती है, लेकिन एंटीगोनी अकेले ही अपने फ़र्ज़ को निभाने निकल पड़ती है।

“If that is what you think, / I should not want you, even if you asked to come. / You have made your choice, you can be what you want to be. / But I will bury him; and if I must die, I say that this crime is holy.”

बहुत जल्द क्रेओन को खबर मिलती है कि किसी ने पोलिनीसीस की मिट्टी पूरी कर दी है। जब पता चलता है कि ये काम एंटीगोनी ने किया है, तो वो आग-बबूला हो जाता है। एंटीगोनी बेझिझक अपने अमल का बचाव करती है और कहती है कि वो ख़ुदा के क़ानून के आगे इंसानी हुक्म को नहीं मान सकती। ग़ुस्से में क्रेओन दोनों बहनों को मौत की सज़ा देता है, मगर जल्द ही इस्मीन को बचा लेता है और हुक्म देता है कि एंटीगोन को ज़िंदा गुफ़ा में बंद कर दिया जाए। इस बीच हेमोन, जो एंटीगोन का मंगेतर और क्रेओन का बेटा है, अपने बाप से रहम की दरख़्वास्त करता है। दोनों में झगड़ा बढ़ जाता है — बेटा अपने बाप पर ज़ुल्म का इल्ज़ाम लगाता है और क्रेओन उसे औरत का ग़ुलाम कह कर नीचा दिखाता है।

“All men make mistakes, but a good man yields when he knows his course is wrong, and repairs the evil.”

अंधे पैगंबर टायरेसियस क्रेओन को ख़बरदार करते हैं कि देवता उसके इस ज़ुल्म से गुस्से में हैं और अगर उसने दिल न बदला तो उसके बेटे की मौत तय है। पहले तो क्रेओन उन्हें झूठा कह कर भगा देता है, मगर डर के मारे आख़िरकार पछताता है। वो तय करता है कि एंटीगोनी को आज़ाद करेगा और अपने भतीजे पोलिनीसीस को दफ़नाएगा। लेकिन अब बहुत देर हो चुकी होती है।एंटीगोनी ख़ुदकुशी कर चुकी होती है हेमोन उसकी लाश देखकर ख़ुद को मार डालता है, और जब क्रेओन की बीवी यूरीडाइस को बेटे की मौत का इल्म होता है, वो भी जान दे देती है। आख़िर में क्रेओन अकेला रह जाता है, अपने गुनाह और घमंड के बोझ तले टूटा हुआ, जबकि कोरस आख़िरी नसीहत देता है जो शख़्स अपने घमंड में अंधा हो जाए, उसे तक़दीर कभी माफ़ नहीं करती।

“You chose to live, I chose to die.” 

एक बार मेरे साथ काम करने वाली इक सहकर्मी ने ज़मीर की बुनियाद पर हमारे बॉस के सीधे हुक्म को ठुकरा दिया। हुक्म गैरक़ानूनी तो नहीं था, लेकिन नैतिक तौर पर थोड़ा समझौतापरस्त था। उसे मालूम था कि ऐसा करने से उसकी नोकरी चली जाएगी, करियर तबाह हो जाएगा, फिर भी उसने इंकार कर दिया — क्योंकि कुछ उसूल ऐसे होते हैं जिन पर समझौता नहीं किया जा सकता। अगले ही दिन उसे निकाल दिया गया। यह सब देखना — किसी को रोज़ी-रोटी से ज़्यादा इमानदारी चुनते देखना — एक तरफ़ प्रेरणादायक भी लगा तो दूसरी तरफ़ डरावना भी।

सोफोक्लीज़ ने तक़रीबन 441 ईसा पूर्व में एंटीगोनी लिखा था, और ये वही दुविधा बयान करता है — जब क़ानून और ज़मीर आमने-सामने हों, जब हुकूमत का कहा मानना किसी बुनियादी सच्चाई से गद्दारी करने जैसा लगे, तो इंसान क्या करे? एंटीगोनी बादशाह, क्रेओन के हुक्म की बजाय अपने भाई की दफ़न को तरजीह देती है, और उसका यही फ़ैसला आख़िरकार इसमें शामिल सभी लोगों बर्बाद कर देता है।

नाटक की शुरुआत एक गृहयुद्ध के बाद होती है। एंटीगोनी के दो भाई — एटेक्लीस और पोलिनीस, — थेब्स की बादशाहत के लिए लड़ते हुए एक-दूसरे को क़त्ल कर देते हैं। अब बादशाह क्रेओन, एटेक्लीस को को इज़्ज़त के साथ दफ़नाने का हुक्म देता है, लेकिन पोलिनीस को, जिसने शहर पर हमला किया था, उसे बिना दफ़नाए, अपमानित होकर बे-कफ़न पड़ा रहने और ज़लील होने की सज़ा दी जाती है। जो कोई उसे दफ़नाने की जुर्रत करेगा, उसे फाँसी दी जाएगी। यह दरअस्ल एक सियासी ड्रामा है, जहाँ क्रेओन खुले सज़ा के ज़रिए अपनी हुकूमत को मज़बूत कर रहा है। मगर एंटीगोनी समझती है कि मुर्दों को बे-कफ़न छोड़ना ईश्वरीय नियमों का उल्लंघन है है और उन देवताओं की तौहीन है जो मरहूम की गुनाहगारी की परवाह किए बिना उसे मुनासिब दफ़न का हक़ देते हैं।

एंटीगोनी बार-बार “ख़ुदा के अबदी, अलिखित नियमों का ज़िक्र करती है। वो कहती है कि ज़िंदा लोगों से ज़्यादा हक़ तो मरने वालों का है, क्योंकि मौत के बाद की वफ़ादारी सच्ची और हमेशा रहने वाली होती है। एंटीगोन का कहना है, “मैं मोहब्बत में शामिल होने के लिए पैदा हुई हूँ, नफ़रत में नहीं।” वो आख़िरकार अपने मरे हुए भाई के साथ आराम पाएगी — ये बात उसके ख़ानदान और आसमानी उसूलों के लिए उसकी अटूट वफ़ादारी को साफ़ तौर पर बयान करती है।

“I was born to join in love, not hate”

एंटीगोन और उसकी बहन इस्मीन के दरमियान जो टकराव होता है, वही असल दाँव पर लगी बात को सामने लाता है। इस्मीन उसे एहतियात बरतने की नसीहत देती है — वो दोनों औरतें हैं, हुकूमत के मुक़ाबले बेबस, और नाफ़रमानी का मतलब यक़ीनी मौत है। मगर एंटीगोन इस तर्क को पूरी तरह नामंज़ूर कर देती है। कुछ फ़र्ज़ ऐसे होते हैं जो सियासी इख़्तियार से ऊपर होते हैं, कुछ ज़िम्मेदारियाँ ख़ानदान और देवताओं के लिए ऐसी होती हैं जो अपनी जान बचाने से भी ज़्यादा अहम् होती हैं। सोफ़ोक्लीज़ यहाँ नामुमकिन हालात के लिए दो अकलमंद रवैये दिखाता है — एक तरफ़ हक़ीक़त-पसंद ज़िंदा रहने की कोशिश, और दूसरी तरफ़ असूलों पर डटे रहने वाली मज़हबी-सियासी जद्दोजहद। इनमें से कोई भी रास्ता पूरी तरह सही या ग़लत नहीं ठहराया जा सकता।

“We have only a little time to please the living. But all eternity to love the dead.”

एंटीगोन ने पोलिनीसीस को दो बार दफ़न किया। पहली बार उसने प्रतीकात्मक अनुष्ठान के तौर पर ज़मीन पर हलकी सी गर्द झोंक दी — एक निशानी के रूप में। पहरेदारों ने उस गर्द को हटा दिया, तो वो फिर लौटी और मुकम्मल रस्म के साथ उसे दफ़नाया। ये दोहराव बहुत मायने रखता है — वो कोई जज़्बाती हरकत नहीं कर रही थी, बल्कि सोच-समझकर दिया गया एक बयान था। अपने अमल का अंजाम जानने के बावजूद, गिरफ्तारी के बाद भी, उसने झुकने की बजाय अपने ज़मीर की राह चुनी। सोफ़ोक्लीज़ इस बात पर ज़ोर देता है कि असली नैतिक अमल के लिए हिम्मत और सब्र चाहिए — सिर्फ़ एक बार की नाटकीय बग़ावत नहीं।

क्रेओन से होने वाला टकराव असल में दो तरह की हठधर्मियों को सामने लाता है — जो अपने-अपने उसूलों पर अड़े रहते हैं। क्रेओन का कहना है कि रियासत की हिफ़ाज़त के लिए आज्ञाकारिता ज़रूरी है; अगर किसी एक को भी छूट दी जाए तो हुकूमत की पकड़ कमज़ोर पड़ जाती है, इसलिए उसका हुक्म हालात चाहे जैसे भी हों, मानना ही होगा। दूसरी तरफ़ एंटीगोन का यक़ीन है कि ख़ुदाई क़ानून इंसानी क़ानून से ऊपर है — ख़ानदान की ज़िम्मेदारी और देवताओं का हुक्म सियासत के मफ़ाद से कहीं ज़्यादा अहम हैं। दोनों में से कोई भी झुकने को तैयार नहीं, और यही उनकी सख़्ती आख़िरकार उस वाक़िए को एक त्रासदी बना देती है — जहाँ किसी की जीत मुमकिन नहीं।

थीब्स के बुज़ुर्गों का कोरस किसी एक पक्ष को खुलकर नहीं चुनता, लेकिन सारे हालात को समझने का संदर्भ देता है। वो दोनों तरफ़ के लोगों से हमदर्दी रखते हैं — क्रेओन की ये फ़िक्र कि जंग के बाद शहर में अमन और क़ायदा क़ायम रहना चाहिए, बिल्कुल वाजिब है; लेकिन एंटीगोन की अपने ख़ानदान और दीन के फ़र्ज़ के लिए जो वफ़ादारी है, वो भी क़ाबिल-ए-एहतराम है। सोफ़ोक्लीज़ इस कोरस के ज़रिए ये दिखाता है कि जब कोई कम्युनिटी मुक़ाबले वाली वफ़ादारियों के दरमियान फँस जाती है, तो ऐसे झगड़ों को सुलझाना कितना मुश्किल हो जाता है — ख़ासकर जब दोनों तरफ़ के दावे अपने तौर पर दुरुस्त हों।

…all men make mistakes, but a good man yields when he knows his course is wrong, and repairs the evil. The only crime is pride.”

क्रेओन का बेटा और एंटीगोन का मंगेतर, हेमोन, दोनों के बीच सुलह करवाने की कोशिश करता है। वो अपने बाप को समझाता है कि शहर के लोग एंटीगोन के साथ हमदर्दी रखते हैं, और ये ज़िद अब इस्तिबदाद (तानाशाही) की शक्ल लेने लगी है। अक़्लमंद बादशाह वो होता है जो हालात के मुताबिक़ बदल जाए। मगर क्रेओन इसे समझदारी की नसीहत नहीं, बल्कि बेटे की बग़ावत और अपने इख़्तियार को चुनौती समझता है। सोफ़ोक्लीज़ यहाँ दिखाता है कि जब हुकूमत अपने आपको ख़तरे में महसूस करती है, तो वो अक्सर रुककर सोचने के बजाय अपने ही ग़लतियों पर और अड़ जाती है — क़बूलो-ख़ताई (अपनी भूल मानना) कमज़ोरी लगती है, इसलिए शासक अकसर झुकने के बजाय तबाही का रास्ता चुन लेते हैं, विनम्रता के बजाय विनाश को चुनते हैं।

अंधे पैग़म्बर टायरेसियस ख़ुदाई इंसाफ़ का पैग़ाम लेकर आता है। देवता पोलिनेइसिस के अधूरे पड़े जिस्म और एंटीगोन को दी गई नाइंसाफ़ सज़ा से नाराज़ हैं। वो क्रेओन को आगाह करते हैं कि अगर उसने अब भी अपना रुख़ नहीं बदला, तो अंजाम बहुत भयानक होगा। मगर टायरेसियस की दख़लअंदाज़ी बहुत देर से होती है — क्रेओन आख़िर में मान तो जाता है, लेकिन तब जब तबाही टल नहीं सकती। सोफ़ोक्लीज़ यहाँ ये दिखाता है कि अक्सर इंसान को सच्चाई का एहसास उसी वक़्त होता है जब वो अब किसी त्रासदी को रोकने के क़ाबिल नहीं रहता।

फिर सब कुछ बहुत तेज़ी और ख़ौफ़नाक अंदाज़ में होता है। एंटीगोन उस गुफ़ा में फाँसी लगा लेती है जहाँ उसे ज़िंदा दफ़न किया गया था। हेमोन उसका शव पाता है और उसके बगल में खुद को मार डालता है। क्रेओन की बीवी यूरीडाइस, अपने बेटे की मौत की ख़बर सुनकर, ग़म से बेहाल होकर जान दे देती है। आख़िर में क्रेओन तो ज़िंदा रह जाता है, लेकिन सब कुछ खो चुका होता है — उसका घर तबाह, उसका ख़ानदान मिट चुका, उसका अधिकार खो जाता है, जो जीत समझता था, वही अब सबसे बड़ी शिकस्त बन जाती है। सोफ़ोक्लीज़ हमें दिखाता है कि सियासी जंग जीतने का कोई मायने नहीं अगर उसकी क़ीमत अपने अज़ीज़ों को खो देना हो।

इस नाटक की यही पेचीदगी पिछले ढाई हज़ार साल से बहस को ज़िंदा रखे हुए है। क्या एंटीगोन एक शहीद है या फिर एक हद से ज़्यादा जाए हुई ज़िद्दी इंसान? और क्या क्रेओन एक तानाशाह है या फिर एक ऐसा हाकिम जो जंग के बाद शहर में अमन और नज़्मो-ज़ब्त क़ायम रखने की कोशिश कर रहा है? सोफ़ोक्लीज़ दोनों बातों के हक़ में सबूत देता है, और कोई आसान नैतिक फ़ैसला लेने की गुंजाइश नहीं छोड़ता। असल त्रासदी ये नहीं कि एक सही है और दूसरा ग़लत — बल्कि ये कि दोनों के पास अपने-अपने दुरुस्त दावे हैं, जो एक दूसरे से मेल नहीं खा सकते, और यही टकराव आख़िर में सब कुछ बरबाद कर देता है।

क्रेओन आज भी इसलिए अहम है क्योंकि जिस टकराव को वो अपने नाटक में ज़िंदा करती है, वो इंसानी ज़िंदगी से कभी ग़ायब नहीं होता। हर दौर में ऐसे लम्हे आते हैं जब ज़मीर और क़ानून में फासला पैदा हो जाता है — जब ख़ानदानी वफ़ादारी शहर के क़ानून से टकराती है, या जब ईमानी यक़ीन दुनियावी हुकूमत को चुनौती देता है। सोफ़ोक्लीज़ कोई आसान जवाब नहीं देता; वो दिखाता है कि आज्ञापालन की भी क़ीमत है और बग़ावत की भी। ऐसी हालात में हर रास्ता दर्द की तरफ़ ले जाता है। एंटीगोन अपने उसूलों पर क़ायम रहकर जान दे देती है — उसका ये अमल एक तरफ़ बहादुरी है, तो दूसरी तरफ़ बर्बादी भी। और क्रेओन ज़िंदा तो रह जाता है, मगर जिस तरह की तन्हाई और पछतावे में जीता है, वो बचना भी एक सज़ा बन जाता है।

ये नाटक अच्छाई की जीत या बुराई की हार की सीधी-सादी बात नहीं करता। ये दिखाता है कि ज़िंदगी के सबसे अहम टकराव अकसर अच्छी और बुरी चीज़ों के बीच नहीं, बल्कि दो सही लेकिन टकराने वाले उसूलों के दरमियान होते हैं। यही समझ, यही त्रासदी — जब दोनों तरफ़ हक़ हो मगर उन्हें एक साथ निभाना मुमकिन न हो — सोफ़ोक्लीज़ के नाटकों की पहचान बन जाती है। और शायद इसी वजह से एंटीगोन हर दौर में लोगों से बात करती रहती है — उस दौर से भी, जहाँ इंसान हुकूमत की हदों और अपने ज़मीर की पुकार, दोनों के सामने जवाबदेह होता है।

“Alas, how terrible is wisdom when it brings no profit to the man that’s wise!”. 

आज के दौर में महत्व

Sophocles की Antigone आज भी इसलिए मायने रखती है क्योंकि इसमें ऐसे हमेशा ज़िंदा रहने वाले मुद्दे हैं जो हर इंसान और समाज से जुड़ते हैं — ज़मीर बनाम हुकूमत का क़ानून, नैतिकता बनाम ताक़त, और मर्द-औरत की बराबरी का मसला। ये नाटक तक़रीबन 441 ई.पू. में लिखा गया था, मगर इसके सवाल आज भी इंसाफ़, सियासत और इंसानी हक़ूक़ की बहस में गूंजते हैं।

उच्चतर क़ानून बनाम इंसानी क़ानून 

इस कहानी का असल टकराव एंटीगोनी  के ज़मीर की सच्चाई और बादशाहक्रेओन के हुक्म के बीच है। एक तरफ़ है रूहानी या ख़ुदाई कानून, और दूसरी तरफ़ इंसानों का बनाया हुआ क़ानून। आज भी यही बहस होती है कि: – सिविल नाफ़रमानी यानी किसी नाइंसाफ़ी वाले क़ानून को अमन-ओ-सुकून से तोड़कर अपना एहतिजाज जताना जैसे क्रेओन ने किया। उसने ऊँचे उसूल की खातिर सज़ा कबूल की। बाद में मार्टिन लूथर किंग जूनियर जैसे लोगों ने भी उसके जज़्बे से रोशनी पाई। –

क़ानून बनाम अख़लाक़ियत

क्या हर वक्त हुकूमत का कहा मानना सही है? या कुछ वक़्त ऐसे भी आते हैं जब ज़मीर और इंसाफ़ की बात सुनना फ़र्ज़ बन जाता है? यही सवाल आज भी उन तहरीकों में उठता है जो ज़ालिम या ग़ैर-अख़लाक़ी सियासी फ़ैसलों के खिलाफ़ आवाज़ बुलंद करती हैं।

ज़ुल्म और सियासी अक़्लमंदी

क्रेओन की शख़्सियत एक सबक है — बे-लिमिट ताक़त और घमंड इंसान को बरबाद कर देता है। वो अपने बेटे, लोगों या नबी तिरेसियास की बात नहीं सुनता, और इसी ज़िद के नतीजे में अपना पूरा घर खो देता है। ये बताता है कि लीडर अगर सिर्फ़ अपनी सुनें, तो वो अपनी कौम को भी नुकसान पहुँचाते हैं।

जनता की आवाज़

जब क्रेओन अपने हुक्म को आख़िरी फ़ैसला समझता है, तब कोरस और उसका बेटा हेमोन कहते हैं कि लोग उससे मुत्तफ़िक़ नहीं हैं। इससे ये सीख मिलती है कि अवाम की आवाज़ और उनके हक़ूक़ ही असली ताक़त हैं।

औरत और मर्द की बराबरी

यह नाटक अपनी औरत किरदार एंटीगोन के ज़रिए औरतों की क़द्र और हिम्मत को दिखाता है। वो उस जमाने में, जब औरतों को चुप रहने की तालीम दी जाती थी, अपने ज़मीर की सुनती है और खुद सियासी व मज़हबी फ़ैसला करती है। इससे साबित होता है कि अक़्ल, हिम्मत और अज़्म सिर्फ़ मर्दों की जायदाद नहीं। उसकी बहन इस्मीन शुरू में समाज के दबाव में झुक जाती है और कहती है कि “हम औरतें मर्दों से लड़ने के लिए नहीं बनीं” — ये फर्क आज तक दिखाता है कि बराबरी और एहतिराम की लड़ाई पूरी तरह खत्म नहीं हुई।

वफ़ादारी और इंसानी इज़्ज़त

इस नाटक में इंसान की वफ़ादारी अपने घराने, हुकूमत और रब के दरम्यान  की आज़माइश होती है। एंटीगोनी अपने भाई को दफ़्न करने का फ़ैसला करती है, चूँकि वो अपने ख़ानदान और मज़हबी फ़र्ज़ को हुकूमत के हुक्म से ऊपर रखती है। आज भी ये सवाल ज़िंदा है कि जब परिवार और राज्य के फ़राइज़ टकराएँ तो इंसान क्या चुने। अंत में एंटीगोन अपने भाई की इज़्ज़त और इंसानियत के लिए लड़ती है — उसकी ये कोशिश “रियासती अक़्ल” के बजाय इंसानी एहसास और इज़्ज़त का पैग़ाम देती है। यही जज़्बा उसे हमेशा ज़िंदा रखता है।

क्यों पढ़े

नाटक में जालिम शासक क्रेओन का किरदार दिखाता है कि जब सत्ता में बैठे लोग अपनी गलतियाँ नहीं मानते, तो विनाश तय हो जाता है। उसकी ज़िद और घमंड से न केवल एंटीगोनी बल्कि पूरा परिवार तबाह हो जाता है। यह कहानी हमें सोचने पर मजबूर करती है कि ताकत के साथ दया और न्याय भी ज़रूरी हैं।

एंटीगोनी हमें सिखाती है कि कभी-कभी सच के लिए कानून तोड़ना भी ज़रूरी होता है — यही “सिविल नाफ़रमानी” (civil disobedience) कहलाता है। वह अपने पारिवारिक फ़र्ज़ को शासन के नियमों से ऊपर रखती है, और यह दिखाती है कि प्यार और वफ़ादारी कभी-कभी रिवाज और नीति से ज़्यादा अहम होती हैं।

नाटक में स्त्री के किरदार पर भी बहुत ज़ोर दिया गया है। एंटीगोनी एक औरत होते हुए भी, एक शक्तिशाली राजा के सामने डटकर खड़ी होती है। वह प्राचीन यूनानी समाज के उन नियमों को चुनौती देती है, जहाँ औरत से चुप रहने की उम्मीद की जाती थी। इस तरह यह कहानी आज भी लैंगिक समानता और नैतिक हिम्मत की मिसाल है।

“एंटीगोनी” यूनानी साहित्य का एक महान शाहकार है जो दिखाता है कि इंसान की ज़िद और अहंकार किस तरह विनाश का कारण बनते हैं। यह नाटक हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि न्याय, विश्वास और इंसानी ज़मीर की आवाज़ कितनी अहम है। इसी वजह से “एंटीगोनी” आज भी उतनी ही अर्थपूर्ण और सशक्त कहानी है जितनी ढाई हज़ार साल पहले थी।

‘एंटीगोनी’ से नेताओं के लिए सीख

 सोफोकल्स के नाटक ‘एंटीगोनी’ से आज के नेता कई महत्वपूर्ण बातें सीख सकते हैं, जैसे कि व्यक्तिगत गरिमा और मानवीय/ईश्वरीय कानून का राज्य के कानून पर महत्व, उग्रवाद और असहिष्णुता के खतरे, और सत्ता के दुरुपयोग के दुष्परिणाम। नेताओं को यह भी समझना चाहिए कि किसी भी एक अकेले व्यक्ति का हठ और सत्ता पर नियंत्रण, और व्यक्तियों के बीच के तनाव और क्रोध को कम करने के बजाय बढ़ाना, समाज के लिए विनाशकारी हो सकता है।

कानून का संघर्ष

एक नेता को यह सोचना चाहिए कि क्या राज्य के कानून और ईश्वरीय या नैतिक कानून के बीच टकराव की स्थिति में एक को दूसरे पर प्राथमिकता देनी चाहिए। ‘एंटीगोनी’ सिखाता है कि राज्य के कानून की निरंकुशता और व्यक्तियों की गरिमा का हनन विनाशकारी हो सकता है।

उग्रवाद और असहिष्णुता के खतरे

जब नेता अपने नागरिकों को “हम” और “वे” में बाँटते हैं, तो न्याय की परिभाषा संकुचित हो जाती है, और क्रोध, भय और आपसी अवमानना ​​बढ़ जाती है। ‘एंटीगोन’ एक नेता के उग्रवादी रवैये के परिणामों को दर्शाता है, जो समाज में न केवल राजनीतिक, बल्कि पारिवारिक और सामाजिक उथल-पुथल भी मचा सकता है।

सत्ता का दुरुपयोग

नाटक एक शक्तिशाली नेता (क्रेओन) द्वारा सत्ता के दुरुपयोग और उसके भयानक परिणामों को उजागर करता है। वह अपनी हठधर्मिता से एक व्यक्ति को दंडित करता है, जिससे उसके परिवार और राज्य दोनों को भारी नुकसान होता है। नेताओं को यह याद रखना चाहिए कि उनकी शक्ति का दुरुपयोग निर्दोष लोगों को कष्ट पहुंचा सकता है और सामाजिक ताने-बाने को नष्ट कर सकता है।

परिणामों का अनुमान लगाएं

क्रेओन ने केवल अपनी सत्ता की रक्षा के बारे में सोचा, लेकिन उसने अपने कार्यों के विनाशकारी परिणामों के बारे में नहीं सोचा, जिसके कारण उसने अपना पूरा परिवार खो दिया। नेताओं को हमेशा अपने फैसलों के दूरगामी परिणामों पर विचार करना चाहिए।

न्याय और नैतिकता की भूमिका

एंटीगोनी का कार्य यह दर्शाता है कि कुछ नैतिक और पारिवारिक जिम्मेदारियां राज्य के नियमों से ऊपर हो सकती हैं। आज के नेता अपने निर्णयों में नैतिकता और करुणा को भी ध्यान में रखें, क्योंकि केवल कानून के शासन से न्याय नहीं मिलता है।

तनाव कम करना

हेमोन्स जैसे पात्र दर्शाते हैं कि तनाव कम करने और दोनों पक्षों में समन्वय स्थापित करने की कोशिश करने वाले लोगों को भी नुकसान उठाना पड़ सकता है। नेताओं को एक ऐसा माहौल बनाना चाहिए जहाँ असहमति और तनाव को शांत करने वाले सुझावों को सुना जा सके, न कि उन्हें दबाया जा सके।

लोकतंत्र और जवाबदेही

जवाबदेही तय करें

नाटक दिखाता है कि जब कोई नेता गलत निर्णय लेता है, तो उसे उसके लिए जवाबदेह होना चाहिए। क्रेओन के अहंकार और जिद के कारण जो तबाही हुई, वह उसकी जवाबदेही की विफलता को दर्शाती है।

सहानुभूति और लचीलापन

हेमन की बात पर ध्यान दें, जो अपने पिता क्रेओन से कहता है कि एक समझदार नेता के लिए लचीला और खुला दिमाग रखना महत्वपूर्ण है। आज के नेताओं को भी अपनी नीतियों में सहानुभूति और लचीलापन दिखाना चाहिए।


About the author: Dinesh Dhawane

Dinesh Dhawane - Nagpur Book ClubDinesh Dhawane is a passionate bibliophile, rare and vintage book collector, and reviewer, with one of the largest personal libraries in the country. Deeply drawn to Marathi, Hindi, and Urdu literature, he brings sensitivity and insight to his reviews.

He has also authored several academic works and, as a Core Committee Member of the Nagpur Book Club and Nagpur Film Society, actively promotes literary and cinematic culture.

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